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1.ऋक्प्रातिशाख्यानुसारं समानाक्षराणां का संख्या?
(A) षड्
(C) पञ्च
(B) अष्ट ✓
(D) सप्त
ऋक्प्रातिशाख्य (शौनकाचार्य रचित) के अनुसार समानाक्षराणि की संख्या अष्ट (आठ) है।
इसकी पुष्टि ऋक्प्रातिशाख्य के प्रथम पटल (संज्ञा-परिभाषा) के इस प्रसिद्ध सूत्र से होती है – “अष्टौ समानाक्षराण्यादितः”
इसका अर्थ है कि वर्णमाला के आरंभ में आने वाले आठ वर्ण ‘समानाक्षर’ कहलाते है।
ये आठ वर्ण हैं— अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, और ॠ (यहाँ ‘लृ’ को इसमें शामिल नहीं किया गया है।
समानाक्षरों के पश्चात् आने वाले चार वर्ण (ए, ऐ, ओ, औ) ‘सन्ध्यक्षर’ कहलाते हैं।
2.शारिपुत्रप्रकरणमस्ति-
(A) माघप्रणीतम्
(B) श्रीहर्षप्रणीतम्
(C) अश्वघोषप्रणीतम् ✓
(D) बिल्हणप्रणीतम्
शारिपुत्र प्रकरण संस्कृत साहित्य का पहला और सबसे प्राचीनतम उपलब्ध नाटक है, जो अपूर्ण (अधूरा) है।
• रचयिता: इसकी रचना प्रसिद्ध बौद्ध कवि अश्वघोष ने की थी, जो सम्राट कनिष्क के राजकवि थे।
• कथानक: इसमें कुल नौ अंक (भाग) हैं, जिनमें भगवान बुद्ध के प्रमुख शिष्य शारिपुत्र और मौद्गल्यायन के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने की कथा का वर्णन है।
• सांस्कृतिक महत्व: यह नाटक भारतीय साहित्य और संस्कृत नाटक परंपरा की शुरुआत का सबसे अहम ऐतिहासिक प्रमाण माना जाता है।
3.कः कोशः कारणशरीरं भवति?
(A) मनोमयकोशः
(B) आनन्दमयकोशः ✓
(C) विज्ञानमयकोशः
(D) प्राणमयकोशः
आनन्दमय कोश कारणशरीर (Causal Body) होता है।
वेदांत और योग दर्शन के अनुसार:
कारणशरीर वह अवस्था या मूल कारण है, जिससे स्थूल और सूक्ष्म शरीर उत्पन्न होते हैं。 यह आत्मा का सबसे आंतरिक आवरण है।
आनन्दमय कोश में अज्ञान, वासनाएं, और कर्मों के संस्कार बीज रूप में संचित रहते हैं। गहरी नींद (सुषुप्ति) में मनुष्य इसी अवस्था का अनुभव करता है,जहाँ मन और बुद्धि के कार्य बंद हो जाते हैं और केवल परमानंद या शांति का अहसास होता है।
4.अधोऽङ्कितानां केन सह कस्य सम्बन्धः?
(A) पुरुषः (I) विकृतिः
(B) वाक् (II) प्रकृतिर्विकृतिः
(C) शब्दः (III) प्रकृतिः
(D) मूलप्रकृतिः (IV) न प्रकृतिर्न विकृतिः
अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत:
(A). (A)- (IV), (B)- (III), (C)- (I), (D)- (II)
(B). (A)- (IV), (B)- (II), (C)- (I), (D)- (III)
(C). (A)- (IV), (B)- (I), (C)- (II), (D)- (III) ✓
(D). (A)- (III), (B)- (I), (C)- (IV), (D)- (II)
मूलप्रकृतिविकृतिर्महदाद्या: प्रकृतिविकृतय:सप्त।
षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृति:पुरुष:।। (सांख्यकारिका, ३)
• मूलप्रकृति विकृति नहीं होती।
• महत्, अहंकार और पाँच तन्मात्रा (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) आदि सात तत्व प्रकृति और विकृति होतेंं हैं।
• सोलह विकार केवल विकृति होतेंं हैं। इनमेंं निम्नलिखित तत्व आते हैंं –
– पंच ज्ञानेंद्रिय – चक्षु, घ्राण, रसना, श्रोत्र, त्वक्
– पंच कर्मेंद्रिय – वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ
– पंच महाभूत – आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी
– मन
• पुरुष प्रकृति भी नहीं होता और विकृति भी नहीं होता।
5.रससम्प्रदायस्य आचार्यो स्तः?
(A) भरतमुनिः
(B) वामनः
(C) क्षेमेन्द्रः
(D) अभिनवगुप्तः
अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत-
(A). (A) एवम् (B)
(B). (A) एवम् (C)
(C). (A) एवम् (D) ✓
(D). (B) एवम् (D)
भरतमुनि: इन्हें संस्कृत काव्यशास्त्र और रस संप्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है। उनका प्रसिद्ध ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ है, जिसमें उन्होंने सर्वप्रथम रस का विस्तृत विवेचन किया है।
अभिनवगुप्त: ये भरतमुनि के रससूत्र (विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः) के प्रमुख व्याख्याकार हैं, जिन्हें ‘अभिव्यक्तिवाद’ का प्रणेता माना जाता है।
वामन: ये ‘रीति संप्रदाय’ के प्रवर्तक हैं।
क्षेमेन्द्र: ये ‘औचित्य संप्रदाय’ के प्रवर्तक हैं।
6.के वर्णाः स्वयंप्रकाशन्ते?
(A) मूलस्वराः
(B) अन्तस्थाः
(C) संयुक्तस्वराः
(D) ऊष्मवर्णाः
अत्र समीचिनं विकल्पं चिनुत-
(A). (A) एवम् (B)
(B). (B) एवम् (D)
(C). (A) एवम् (C) ✓
(D). (C) एवम् (D)
स्वर- “स्वयं राजन्ते प्रकाशन्ते इति स्वरा:”
अर्थात् स्वयं प्रकाशित वर्णों को स्वर कहते हैं।
“स्वर्यते शब्द्यते व्यजनमेभिरिति वा स्वरा:”
जिन वर्णों के द्वारा व्यजन वर्णों का उच्चारण होता है, वे स्वर कहे जातें हैं।
पाणिनीयशिक्षा के अनुसार ये 22 हैं- अ, आ, आ३, इ, ई, ई३, उ, ऊ, ऊ३, ऋ, ऋ, ऋ३, ऌ, ऌ३, ए, ए३, ओ, ओ३, ऐ, ऐ३, औ, औ३।
व्यजन- “अन्वग् भवतीति व्यंजनम्”
अर्थात् स्वरों का अनुगमन करने वाले वर्ण व्यंजन कहे जाते हैं। “व्यज्यन्ते स्वरसाहाय्येन उच्चार्यन्ते इति व्यंजनानि”
अर्थात् स्वरों की सहायता से उच्चारित या अभिव्यक्त होने वाले व्यंजन कहे जाते हैं। जैसे क, ख, ग, घ आदि।
7.सम्प्रति-प्राप्तेषु सामवेदस्य ब्राह्मणेषु द्वौ ब्राह्मणौ कौ स्तः?
(A) चरक-ब्राह्मणम्
(B) गालव-ब्राह्मणम्
(C) संहितोपनिषद्-ब्राह्मणम्
(D) वंशब्राह्मणम्
अधस्तनेषु समुचितं विकल्पं चिनुत-
(A). (A) एवम् (C)
(B). (A) एवम् (D)
(C). (C) एवम् (D) ✓
(D). (B) एवम् (C)
अन्य वेदों के ब्राह्मणों की अपेक्षा सामवेद के ब्राह्मणों की संख्या अधिक है। सामवेद के 8 ब्राह्मण उपलब्ध हैं। सायण ने इनका उल्लेख इस प्रकार किया है।-
“अष्टौ हि ब्राह्मणग्रंथाः प्रौढं ब्राह्मणमादिमम्।
षड् विंशाख्यं द्वितीयं स्यात् ततः सामविधीर्भवेत।
आर्षेयं देवताध्यायो भवेदुपनिषत् ततः।
संहितोपनिषद् वंशो ग्रंथा अष्टावितीरिताः।।”
तांड्य ब्राह्मण (प्रौढ, पंचविंश)
षड् विंश ब्राह्मण
सामविधान ब्राह्मण
आर्षेय ब्राह्मण
देवताध्याय ब्राह्मण
उपनिषद् ब्राह्मण ( मंत्रब्राह्मण, छान्दोग्यब्राह्मण)
संहितोपनिषद् ब्राह्मण
वंशब्राह्मण
8.तर्कभाषानुसारं अयुतसिद्धयोः कः सम्बन्धः?
(A) संयोगः
(B) समवायः ✓
(C) विषय-विषयिभावः
(D) आधाराधेयभावः
आचार्य गौतम के द्वारा प्रणीत न्याय दर्शन के सूत्र ग्रंथ का नाम है न्याय सूत्र और उसके प्रकरण ग्रंथ के नाम है तर्क भाषा जिसके प्रणेता है केशव मिश्र।
तर्कभाषाकार ने समवाय सम्बन्ध की व्याख्या में ‘अयुतसिद्ध’ पद का प्रयोग किया-
तावेवायुतसिद्धौ द्वौ विज्ञातव्यौ ययोर्द्वयोः। अनशयदेकमपराश्रितमेवावतिष्ठते।।
अर्थात्, उन दोनों पदार्थों को अयुतसिद्ध जानना चाहिए, जिन दोनों पदार्थों में से एक नष्ट न होता हुआ, दूसरे पदार्थ पर आश्रित होकर ही रहता है।
इस सिद्धांत के मुख्य ५ प्रकार (उदाहरण) –
1.अवयव और अवयवी
2.गुण और गुणी
3.क्रिया और क्रियावान्
4.जाति और व्यक्ति
5.विशेष और नित्यद्रव्य
9.”वाक्यविन्यासो रीतिरिति” केनोक्तम्?
(A) राजशेखरेण ✓
(B) वामनेन
(C) कुन्तकेन
(D) दण्डिना
वाक्यविन्यासो रीतिः (वाक्य का विन्यास ही रीति है) यह कथन आचार्य राजशेखर का है। उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ काव्यमीमांसा में यह परिभाषा दी है।
•राजशेखर: इनके अनुसार, — “वाक्यविन्यासक्रमो रीतिः” (वाक्यों की क्रमबद्ध रचना/विन्यास ही रीति है)।
• वामन: रीति संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य वामन ने विशिष्ट पद-रचना को रीति माना है, और कहा है— “रीतिरात्मा काव्यस्य” अर्थात् रीति काव्य की आत्मा है।
•कुन्तक: ये वक्रोक्ति संप्रदाय के प्रवर्तक हैं और इनका प्रसिद्ध कथन है— “वक्रोक्तिः काव्यजीवितम्”।
•दण्डी: अलंकार संप्रदाय से जुड़े आचार्य दण्डी ने रीति के लिए ‘मार्ग’ शब्द का प्रयोग किया।
10.पराशरस्मृतौ कति अध्यायाः विद्यन्ते?
(A) १०
(B) १५
(C) १२ ✓
(D) १४
पराशरस्मृति में कुल १२ (12) अध्याय हैं।
• अध्याय १-३ (आचार काण्ड): कलियुग के धर्म, चारों वर्णों के सामान्य कर्तव्य और दैनिक आचार-विचार का वर्णन।
• अध्याय ४-१२ (प्रायश्चित काण्ड): विभिन्न प्रकार के पापों, अज्ञानवश हुई भूलों, शुद्धि के नियमों और उनके निवारण के लिए प्रायश्चित का विस्तृत विधान।
• कुल श्लोक: इस ग्रंथ में कुल ५९७ श्लोक हैं।
• कलियुग का धर्म: शास्त्रों के अनुसार कलियुग के लिए पराशरस्मृति के नियमों को ही सर्वोपरि माना गया है (“कलौ पाराशरः स्मृतः”)।
11. अधोलिखितासु सूत्रपङ्क्तिषु-सञ्ज्ञासूत्रम्, परिभाषासूत्रम् विधिसूत्रम्, नियमसूत्रम् एवं क्रमेण विन्यस्ती कुरुत –
1. कर्तृस्थे चाशरीरे कर्मणि
2. हलन्त्यम्
3. अत इञ्
4. समर्थः पदविधिः
उपरि उक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत –
(A) 1, 3, 4, 2
(B) 2, 4, 3, 1 ✓
(C) 4, 3, 1, 2
(D) 3, 1, 2, 4
सञ्ज्ञा, परिभाषा, विधि एवं नियम सूत्र का क्रम-
2. हलन्त्यम् (सञ्ज्ञासूत्र)
4. समर्थः पदविधिः (परिभाषासूत्र)
3. अत इञ् (विधिसूत्र)
1. कर्तृस्थे चाशरीरे कर्मणि (नियमसूत्र)
2.सूत्र-
हलन्त्यम् (1.3.3)। (सञ्ज्ञासूत्र)
सूत्रार्थ –
उपदेश में अन्तिम हल् इत् सञ्ज्ञक होता है।
4.सूत्र- समर्थः पदविधिः (2.1.1)। (परिभाषासूत्र)
सूत्रार्थ-
पदों से सम्बन्ध रखने वाला कार्य समर्थ पदों के आश्रित होता है।
3.सूत्र-
अत इञ् (4.1.95)। (विधिसूत्र)
सूत्रार्थ –
अपत्य अर्थ में षष्ठी समर्थ अदन्त (ह्रस्व अकारान्त) प्रातिपदिक से इञ् प्रत्यय विकल्प से होता है।
1.सूत्र-
कर्तृस्थे चाऽशरीरे कर्मणि (1.3.37)।(नियमसूत्र)
सूत्रार्थ-
कर्ता में स्थित शरीर से अतिरिक्त कर्म होने पर ‘नी’ धातु से आत्मनेपद होता है।
12. अधोलिखिते कथने पठित्वा समुचितमुत्तरं चिनुत –
कथनम्-I : मुख्यां वृत्तिं परित्यज्य गुणवृत्यार्थदर्शनम् । यदुद्दिश्य फलं तत्र शब्दो नैव स्खलद्गतिः ।।
कथनम्-II : लक्ष्यं न मुख्यं नाप्यत्र बाधो योगः फलेन नो। न प्रयोजनमेतस्मिन् न च शब्दः स्खलद्गतिः ।।
यथोचितं विकल्पं चिनुत –
(A) उभये कथने सत्ये स्तः। ✓
(B) उभये कथने असत्ये स्तः ।
(C) प्रथमं कथनं सत्यं किन्तु द्वितीयम् असत्यम् अस्ति।
(D) प्रथमं कथनम् असत्यं किन्तु द्वितीयं सत्यम् अस्ति।
मुख्यां वृत्तिं परित्यज्य गुणवृत्यार्थदर्शनम् ।
यदुद्दिश्य फलं तत्र शब्दो नैव स्खलद्गतिः ।।
– आचार्य आनन्दवर्धन ने यह कारिका उस खंडन के संदर्भ में दी है, जिसमें कुछ विद्वान ‘ध्वनि’ (काव्य की आत्मा) को केवल ‘भक्ति’ (लक्षणा या गौण वृत्ति) का ही हिस्सा मानते हैं। आनन्दवर्धन का मानना है कि लक्षणा का कार्य केवल मुख्य अर्थ की बाधा को दूर करके किसी अन्य अर्थ का बोध कराना है, लेकिन ध्वनि (व्यंजना) का कार्य उससे कहीं आगे जाकर एक आनंदित करने वाले ‘सौंदर्यपूर्ण अर्थ’ (व्यंग्यार्थ) को प्रकट करना है।
लक्ष्यं न मुख्यं नाप्यत्र बाधो योगः फलेन नो।
न प्रयोजनमेतस्मिन् न च शब्दः स्खलद्गतिः ।।
यह श्लोक संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘काव्यप्रकाश’ (आचार्य मम्मट द्वारा रचित) के द्वितीय उल्लास से लिया गया है। यह कारिका व्यञ्जना व्यापार (शब्द की विशेष अर्थ देने की क्षमता) की अनिवार्यता और श्रेष्ठता को सिद्ध करती है।
यह कारिका ‘गङ्गायां घोषः’ (गंगा में गाँव) के उदाहरण के माध्यम से समझाई जाती है। जब कोई कहता है कि “गंगा में बस्ती (घोष) है”, तो यहाँ ‘गंगा’ शब्द का मुख्य अर्थ ‘प्रवाह’ (पानी) है, जो बाधित हो जाता है। इसका लक्ष्यार्थ ‘तट’ (किनारा) निकलता है।
प्रश्न यह उठता है कि क्या किनारे पर शीतलता और पावनता जैसे विशेष अर्थ (प्रयोजन) को बताने के लिए लक्षणा का ही प्रयोग मान लिया जाए? इसी शंका का निवारण करते हुए आचार्य मम्मट कहते हैं कि उस विशेष अर्थ (प्रयोजन) को लक्षणा से नहीं, बल्कि व्यञ्जना से ही समझा जा सकता है, क्योंकि वहाँ लक्षणा की निम्नलिखित शर्तें पूरी नहीं होती हैं :-
लक्ष्यं न मुख्यम् : प्रयोजन (पावनता) का मुख्य अर्थ से कोई सीधा संबंध नहीं होता।
नाप्यत्र बाधः : प्रयोजन (जैसे- गंगा के तट का पावन होना) में कोई विरोध या बाधा नहीं है (जबकि लक्षणा के लिए मुख्यार्थ में बाधा होनी चाहिए)।
योगः फलेन नो : मुख्य अर्थ और प्रयोजन के बीच कोई प्रसिद्ध संबंध नहीं होता।
न प्रयोजनम् तस्मिन् : प्रयोजन में किसी अन्य प्रयोजन की कल्पना नहीं की जा सकती (यदि ऐसा हो तो ‘अनवस्था’ दोष आ जाएगा—यानी कारण की कभी समाप्ति नहीं होगी)।
न च शब्दः स्खलद्गतिः : शब्द अपने मुख्य अर्थ को छोड़ने के बाद तट (लक्ष्यार्थ) को बताने में असमर्थ नहीं होता, बल्कि वह सीधा व्यंग्यार्थ (पावनता आदि) को भी स्पष्ट रूप से प्रतिपादित कर देता है, उसकी गति रुकती (स्खलित) नहीं है।
13. अधोलिखितेषु के द्वे आत्मनेपदविधायकसूत्रे स्तः?
(1) पूर्ववत्सनः
(2) परेर्मृषः
(3) समवप्रविभ्यः स्थः
(4) उपाच्च
समुचितमुत्तरं चिनुत –
(A) 1 एवम् 3 ✓
(B) 2 एवम् 3
(C) 3 एवम् 4
(D) 1 एवम् 4
दिए गए विकल्पों में से (1) पूर्ववत्सनः और (3) समवप्रविभ्यः स्थः ये दोनों आत्मनेपदविधायक सूत्र हैं।
अतः सही उत्तर (1) और (3) है।
(1) पूर्ववत्सनः (अष्टाध्यायी १.३.६२):
यह सूत्र निर्दिष्ट करता है कि सन् (इच्छाार्थक) प्रत्यय लगने से पूर्व जो धातु आत्मनेपदी होती है, वह सन् प्रत्ययान्त होने के बाद (सन्नन्तावस्था में) भी आत्मनेपद के ही प्रत्यय लेती है। (उदा. ‘आस्’ धातु से ‘आसिसिषते’)।
(3) समवप्रविभ्यः स्थः (अष्टाध्यायी १.३.२२):
यह सूत्र विधान करता है कि सम्, अव, प्र, और वि उपसर्गों के बाद यदि ‘स्था’ धातु आए, तो उससे कर्ता अर्थ में आत्मनेपद प्रत्यय होते हैं। (उदा. संतिष्ठते, अवतिष्ठते, प्रतिष्ठते, वितिष्ठते)।
(2) परेर्मृषः (अष्टाध्यायी १.३.८२):
यह परस्मैपद विधायक सूत्र है। यह परि उपसर्ग के बाद ‘मृष्’ (सहन करना) धातु आने पर क्रिया का फल कर्तागामी होने पर भी परस्मैपद का विधान करता है (उदा. परिमृष्यति)।
(4) उपाच्च (अष्टाध्यायी १.३.८४): यह भी परस्मैपद विधायक सूत्र है। यह उप उपसर्ग पूर्वक ‘रम्’ धातु के योग में परस्मैपद का विधान करता है।
14.सांख्यकारिकायां ‘संघातपरार्थत्वात्’ अनेन हेतुना साध्यते-
(A) पुरुषः ✓
(B) अव्यक्तम्
(C) महत्
(D) अहङ्कारः
सांख्यकारिका में ‘संघातपरार्थत्वात्’ (अर्थात पदार्थों के संघटन/समूह का किसी अन्य के लिए होना) हेतु से पुरुष की सिद्धि की गई है।
ईश्वरकृष्ण रचित सांख्यकारिका की कारिका संख्या 17 में पुरुष (आत्मा) के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए पाँच प्रमुख हेतु (कारण) बताए गए हैं:
संघातपरार्थत्वात् (महत्, अहंकार आदि संघात/जड़ समूह दूसरे के प्रयोजन के लिए हैं)।
त्रिगुणादिविपर्ययात् (यह गुणों से विपरीत/परे है)।
अधिष्ठानात् (जड़ समूह का अधिष्ठाता/नियंत्रक होने से)।भोक्तृभावात् (जड़ प्रकृति के भोगों का भोक्ता होने से)।
कैवल्यार्थं प्रवृत्तेः (मोक्ष/कैवल्य के लिए प्रवृत्ति होने से)।
15.अधोऽङ्कितेषु नागेशभट्टस्य ग्रन्थो नास्ति ?
(A) बृहत्रशब्देन्दुशेखरः
(B) लघुशब्देन्दुशेखरः
(C) प्रदीपोद्योतः
(D) माधवीयधातुवृत्तिः
दिए गए विकल्पों में से (D) माधवीयधातुवृत्तिः नागेशभट्ट का ग्रन्थ नहीं है।
यह प्रसिद्ध व्याकरण ग्रन्थ आचार्य सायण (सायणाचार्य) द्वारा लिखा गया है (उन्होंने अपने भाई माधव के नाम पर इसका नामकरण किया था)। यह पाणिनीय धातुपाठ पर आधारित एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्याख्या ग्रन्थ है।
महान वैयाकरण नागेशभट्ट (१८वीं शताब्दी) नव्य-व्याकरण के अप्रतिम विद्वान थे। उनके लिखे प्रमुख ग्रन्थ निम्नलिखित हैं:
• बृहच्छब्देन्दुशेखरः (A): भट्टोजी दीक्षित कृत ‘सिद्धान्तकौमुदी’ पर नागेशभट्ट की विस्तृत और बृहद् टीका।
• लघुशब्देन्दुशेखरः (B): सिद्धान्तकौमुदी पर ही नागेशभट्ट की अत्यंत लोकप्रिय और संक्षिप्त (लघु) व्याख्या, जो व्याकरण के विद्यार्थियों के बीच अनिवार्य रूप से पढ़ी जाती है।
• प्रदीपोद्योतः (C): महाभाष्य की ‘प्रदीप’ टीका (जो कैयट द्वारा रचित है) पर नागेशभट्ट द्वारा लिखी गई प्रसिद्ध ‘उद्योत’ नामक टीका।
16. स्त्रीप्रत्ययानुसारमधोऽङ्कितेषु ‘ ङीष्’ प्रत्ययान्तः शब्दोऽस्ति-
(A) पचन्ती
(B) देवी
(C) भवानी ✓
(D) कुरुचरी
• भवानी: ‘भव’ शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में “इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलआचार्याणामानुक्” (अष्टाध्यायी ४.१.४९) सूत्र द्वारा ‘आनुक्’ का आगम होता है और पुंयोग अर्थ होने के कारण ‘ङीष्’ प्रत्यय लगता है।
• पचन्ती: यहाँ “उगितश्च” (४.१.६) सूत्र से शतृ (उगित्) प्रत्ययान्त होने के कारण ‘ङीप्’ प्रत्यय हुआ है।
• देवी: यह देवट् (टित्) शब्द होने के कारण “टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः” (४.१.१५) सूत्र से ‘ङीप्’ प्रत्ययान्त शब्द है।
• कुरुचरी: ‘कुरुषु चरति इति’ अर्थ में टित् प्रत्यय होने के कारण इसी “टिड्ढाणञ्…” सूत्र से ‘ङीप्’ प्रत्यय लगकर ‘कुरुचरी’ रूप सिद्ध होता है।
अतः सही उत्तर (C) है।
17. संस्कृतव्याकरणानुसारं ‘भवति’ इत्यस्य का सञ्ज्ञा भवति ?
(A) सर्वनामस्थानम्
(B) भ
(C) निष्ठा
(D) पदम् ✓
संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘भवति’ शब्द की (D) पदम् संज्ञा होती है।
विस्तृत व्याख्या:
पद संज्ञा का नियम: महर्षि पाणिनि के सूत्र “सुप्तिङन्तं पदम्” (अष्टाध्यायी 1.4.14) के अनुसार, जिसके अंत में ‘सुप्’ (शब्दरूप के 21 प्रत्यय) या ‘तिङ्’ (धातुरूप के 18 प्रत्यय) लगे हों, उसे पद कहा जाता है।
‘भवति’ का निर्माण: ‘भवति’ शब्द ‘भू’ धातु (होना) में लट लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन का ‘तिप्’ प्रत्यय लगाने से बनता है। ‘तिप्’ एक तिङ् प्रत्यय है, इसलिए ‘भवति’ की ‘पद’ संज्ञा होती है। संस्कृत में नियम है—”अपदं न प्रयुञ्जीत” अर्थात् बिना पद बनाए किसी शब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
(A) सर्वनामस्थानम्: “सुडनपुंसकस्य” (1.1.43) सूत्र से पुल्लिंग और स्त्रीलिंग शब्दों के प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों (सु, औ, जस्) और द्वितीया विभक्ति के एकवचन और द्विवचन (अम्, औट्) प्रत्ययों की ‘सर्वनामस्थान’ संज्ञा होती है।
(B) भ: “यचि भम्” (1.4.18) सूत्र से यकार (य) या स्वर (अ, आ, इ आदि) से शुरू होने वाले प्रत्ययों के परे रहने पर पूर्व शब्द-समुदाय की ‘भ’ संज्ञा होती है।
(C) निष्ठा: “क्तक्तवतू निष्ठा” (1.1.26) सूत्र से ‘क्त’ और ‘क्तवतु’ प्रत्ययों की ‘निष्ठा’ संज्ञा होती है (जैसे: भूत, भूतवान्)।
18.नियमपूर्वकविद्याध्ययने अध्यापकः किं सञ्ज्ञो भवति ?
(A) अधिकरणसञ्ज्ञः
(B) कर्मसञ्ज्ञः
(C) करणसञ्ज्ञः
(D) अपादानसञ्ज्ञः ✓
सही उत्तर (D) अपादानसञ्ज्ञः :संस्कृत व्याकरण में पाणिनी का एक प्रसिद्ध सूत्र है— “आख्यातोपयोगे”।
इस सूत्र के अनुसार, जब नियमपूर्वक (ब्रह्मचर्य आदि नियमों का पालन करते हुए) किसी वक्ता, उपदेष्टा या अध्यापक से विद्या ग्रहण की जाती है, तब उस वक्ता या अध्यापक की अपादान संज्ञा होती है और ‘अपादाने पञ्चमी’ सूत्र से उसमें पंचमी विभक्ति लगती हैं।
उदाहरण: उपाध्यायाद् अधीते (उपाध्याय से पढ़ता है) अथवा छात्रः शिक्षकात् पठति (छात्र शिक्षक से पढ़ता है)। यहाँ उपाध्याय और शिक्षक की अपादान संज्ञा हुई हैं।
(A) अधिकरणसञ्ज्ञः : ‘आधारोऽधिकरणम्’ सूत्र से क्रिया के आधार (स्थान या समय) की अधिकरण संज्ञा होती है, न कि नियमपूर्वक विद्या देने वाले अध्यापक की।
(B) कर्मसञ्ज्ञः : ‘कर्तुरीप्सिततमं कर्म’ सूत्र से कर्ता अपनी क्रिया के द्वारा जिसे सबसे अधिक चाहता है, उसकी कर्म संज्ञा होती है।
(C) करणसञ्ज्ञः : ‘साधकतमं करणम्’ सूत्र से क्रिया की सिद्धि में जो सबसे अधिक सहायक होता है, उसकी करण संज्ञा होती है।
19.’यथा हिरण्यं शुचिधातुमध्ये मेरुर्गिरीणां सरसां समुद्रः’ इदं वचनं कस्मिन् काव्ये विलसति ?
(A) मुद्राराक्षसे
(B) उत्तररामचरिते
(C) किरातार्जुनीये
(D) बुद्धचरिते ✓
यह श्लोक महाकवि अश्वघोष द्वारा रचित महाकाव्य ‘बुद्धचरितम्’ के प्रथम सर्ग से उद्धृत है। इसमें महात्मा बुद्ध (सिद्धार्थ) की जन्म के समय उनकी महिमा और श्रेष्ठता का वर्णन किया गया है।
“यथा हिरण्यं शुचि धातुमध्ये मेरुर्गिरीणां सरसां समुद्रः।
तारासु चन्द्रस्तपतां च सूर्यः पुत्रस्तथा ते द्विपदेषु वर्यः ”।।1/37॥
20. ‘श्रूयतां महाभाग विदर्भो नाम जनपदः तस्मिन् भोज-वंशभूषणम् …….’ इति गद्यखण्डं कस्यां रचनायां विद्यते ?
(A)स्वप्नवासवदत्ते
(B)कादम्बर्याम्
(C)दशकुमारचरिते ✓
(D)हर्षचरिते
यह श्लोक (गद्यांश) संस्कृत के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘दशकुमारचरितम्’ (Dasakumaracharita) से लिया गया है, जिसके रचयिता महाकवि दण्डी (Dandin) हैं।यह गद्यांश विदर्भ देश के राजा के गुणों का विस्तृत और अत्यंत सुंदर वर्णन करता है।
“श्रूयतां महाभाग। विदर्भो नाम जनपदः। तस्मिन् भोज-वंशभूषणम्, अंशावतार इव धर्मस्य, अतिसत्त्वः, सत्यवादी, वदान्यः, विनीतो विनेता प्रजानाम्, रञ्जितभृत्यः कीर्तिमान्…”
इसका संक्षिप्त हिंदी अर्थ:
“हे महाभाग! सुनिए, विदर्भ नाम का एक देश है। उस देश में भोज वंश का आभूषण, धर्म के अवतार के समान, अत्यधिक बलशाली, सत्यवादी, दानी, विनम्र, प्रजा को सही मार्ग पर चलाने वाला, सेवकों को प्रसन्न रखने वाला और कीर्तिमान (राजा राज्य करता था)…”
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