Site icon Rojgar Khoz

UGC NET Sanskrit Mock Test Day 1 Answer Key & Detailed Analysis (Code 25) | Tathastu Academy

UGC NET Sanskrit Mock Test Day 1 Answer Key & Detailed Analysis (Code 25)  Tathastu Academy

Check the UGC NET Sanskrit Mock Test Day 1 Answer Key with detailed explanations and performance analysis (Code 25) . Improve your preparation with expert insights from Tathastu Academy.

1.व्यवहारस्य पादान् क्रमेण नियोजयत –

(1) उत्तरपादः

(2) क्रियापादः

(3) सिद्धिपादः

(4) भाषापादः

समुचितं विकल्पं चिनुत –

(A) 4, 1, 2, 3 ✓

(B) 4, 3, 2, 1

(C) 3, 2, 4, 1

(D) 1, 2, 3, 4
याज्ञवल्क्यस्मृति के व्यवहाराध्याय के अनुसार, प्राचीन भारतीय न्याय व्यवस्था में किसी भी मुकदमे या व्यवहार के चार मुख्य चरण (पाद) होते हैं:
व्यवहार के चत्वारः पादाः (क्रमशः):

  1. भाषापादः (4): यह पहला चरण है, जिसमें वादी (शिकायतकर्ता) न्यायालय के समक्ष अपनी समस्या या प्रतिज्ञा (Plaint) प्रस्तुत करता है।
  2. उत्तरपादः (1): यह दूसरा चरण है, जहाँ प्रतिवादी (आरोपी) वादी के आरोपों का लिखित या मौखिक उत्तर (Reply/Defense) देता है।
  3. क्रियापादः (2): यह तीसरा चरण है, जिसमें दोनों पक्षों के दावों को सिद्ध करने के लिए प्रमाण, साक्ष्य (Evidence), और गवाहों का परीक्षण किया जाता है।
  4. सिद्धिपादः / साध्यपादः (3): यह अंतिम चरण है, जहाँ न्यायकर्ता साक्ष्यों के आधार पर अंतिम निर्णय (Judgment) या न्याय की सिद्धि घोषित करता है।

अतः इस क्रम के अनुसार अनुक्रम (4) भाषापादः (1) उत्तरपादः (2) क्रियापादः (3) सिद्धिपादः बनता है।

  1. कौटिल्यार्थशास्त्रानुसारेण आन्वीक्षकी विद्या अस्ति-

(A) सांख्यं योगो लोकायतं च ✓

(B) धर्माधर्मो

(C) अर्थानथौ

(D) सुशासनम्

कौटिल्यार्थशास्त्र (अर्थशास्त्रम्) के अनुसार ‘आन्वीक्षकी’ विद्या सांख्य, योग और लोकायत दर्शन का समन्वित रूप है। कौटिल्य के विद्या-समुद्देश (विनयाधिकारिक) प्रकरण के अनुसार चार विद्याएँ होती हैं—आन्वीक्षकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति। आन्वीक्षकी में धर्म और अधर्म को त्रयी से, अर्थ और अनर्थ को वार्ता से, तथा न्याय और अन्याय को दण्डनीति से परखा जाता है। अतः सही उत्तर (A) सांख्यं योगो लोकायतं च है।

  1. मनुस्मृतेः टीकाः सन्ति?

(A) चतस्रः ✓

(B) तिस्रः

(C) नव

(D) एकादश

विवरण:मुख्य रूप से मनुस्मृति की चार (४) प्राचीन और सबसे प्रसिद्ध टीकाएँ उपलब्ध हैं:
मेधातिथि (भाष्य)
कुल्लूक भट्ट (मन्वर्थमुक्तावली)
गोविन्दराज (मन्वाशयानसारिणी)
नन्दन (नन्दिनी)
अन्य टीकाकारों में भारुचि, नारायण, राघवानन्द आदि के नाम भी आते हैं, लेकिन परीक्षा और संदर्भ के अनुसार चार प्रमुख टीकाएँ (चतस्रः) ही मान्य हैं।

  1. ‘चत्वारि हस्तशतानि वीशदुत्तराण्यायतेन एतावन्त्येव विस्तीर्णेन पञ्चसप्ततिहस्तानवगाढेन भेदेन निःसृतसर्वतोयं मरुधन्वकल्पमतिभृशं दुर्दर्शनमासीत्’- इति कस्माद् अभिलेखाद् वर्तते ?

(A) रुद्रदाम्नः गिरनाराभिलेखात् ✓

(B) यशोधर्मणः मन्दसौराभिलेखात्

(C) समुद्रगुप्तस्य स्तम्भलेखात्

(D) खारवेलस्य हाथीगुम्फाभिलेखात्

व्याख्या:सन्दर्भ: यह पंक्ति शक क्षत्रप रुद्रदामन प्रथम के प्रसिद्ध गिरनार (जूनागढ़) शिलालेख से ली गई है।अर्थ: इस अंश में सुदर्शन झील के टूटने का वर्णन है। इसमें बताया गया है कि भीषण वर्षा के कारण झील का बांध टूट गया था, जिससे उसका सारा पानी निकल गया और वह अत्यंत “दुर्दर्शन” (देखने में भयावह/मरुस्थल जैसी) हो गई थी।विवरण: अभिलेख में बांध के आयामों (लंबाई 420 हाथ, चौड़ाई 420 हाथ और गहराई 75 हाथ) का स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जिसे सुधार्ने का कार्य रुद्रदामन ने अपने निजी कोष से करवाया था।

  1. सरविलियमजोन्समहोदयः ब्राह्मीलिपेरुत्पत्तिः मन्यते-

(A) सेमेटिकलिपितः ✓

(B) फिनिशिअनलिपितः मिसराक्षरेभ्यः वा

(C) फिनिशिअनलिपेः अरमाइक-अक्षरेभ्यः

(D) फिनिशिअनतः सेबूअन् (हिमिअरेटिक्) लिपितः

सर विलियम जोन्स का विचार है कि ब्राह्मी लिपि का विकास सेमेटिक लिपि से हुआ।
उत्तरी सेमेटिक शाखा की लिपि से ब्राह्मी के उद्भव के विचार के संस्थापक हैं ब्यूलर, डेविड, डिरिञ्ज आदि।

  1. महाभारतस्य पर्वनामानि क्रमेण लिखत –

(1) आदिपर्व

(2) विराट्पर्व

(3) सभापर्व

(4) वनपर्व

समुचितं विकल्पं चिनुत –

(A) 3, 2, 4, 1

(B) 2, 1, 4, 3

(C) 1, 3, 4, 2 ✓

(D) 4, 2, 1, 3

महाभारत के प्रथम चार पर्वों का सही क्रम इस प्रकार है:
आदिपर्व (Adi Parva) – विकल्प (1)
सभापर्व (Sabha Parva) – विकल्प (3)
वनपर्व (Vana Parva) – विकल्प (4)
विराटपर्व (Virata Parva) – विकल्प (2)
अतः सही क्रम 1, 3, 4, 2 है। सही उत्तर:विकल्प (C) 1, 3, 4, 2

  1. द्यूतक्रीडावर्णनं कस्मिन् पर्वणि विद्यते-

(A) सभापर्वणि ✓

(B) कर्णपर्वणि

(C) आदिपर्वणि

(D) स्त्रीपर्वणि

महाभारत के सभापर्व में द्यूतक्रीडा (जुए) का विस्तृत वर्णन है, इसी पर्व में कौरवों और पाण्डवों के बीच हुए इस विनाशकारी द्यूत का प्रसंग और द्रौपदी के चीरहरण जैसी घटनाएँ आती हैं।

  1. रामायणे कस्मिन् काण्डे ‘अहल्याशाप विमोचन’ – वृत्तान्तोऽस्ति-
    (A) अयोध्याकाण्डे

(B) अरण्यकाण्डे

(C) बालकाण्डे ✓

(D) सुन्दरकाण्डे

रामायण के बालकाण्डे (C) में ‘अहल्याशाप विमोचन’ का वृत्तान्त आता है। महर्षि विश्वामित्र द्वारा श्रीराम और लक्ष्मण को अहल्या के उद्धार की यह कथा सुनाई जाती है।
अस्मिन् काण्डे श्रीरामस्य जन्म, बाल्यलीला, शिक्षा, महर्षि-विश्वामित्रेण सह गमनम्, यज्ञरक्षणं तथा च सीताविवाहः वर्णिताः सन्ति।अहल्याशापविमोचनम्: यदा श्रीराम-लक्ष्मणौ महर्षि विश्वामित्रेण सह मिथिलां प्रति गच्छन्तौ आस्ताम्, तदा मार्गे गौतममहर्षेः विजनः आश्रमः आगच्छति। तत्र विश्वामित्रः श्रीरामम् अहल्यायाः शापस्य कथां श्रावयति। श्रीरामस्य आगमनेन स्पर्शेन च अहल्या शापमुक्ता भूत्वा स्वरूपं प्राप्नोति। अतः एषः वृत्तान्तः बालकाण्डस्य (Sargas 48-49) अन्तर्गतः एव भवति।

  1. सुन्दरकाण्डे सर्गाणां संख्या-

(A) 68 ✓

(B) 80

(C) 71

(D) 65

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित ‘रामायण’ के अनुसार, सुन्दरकाण्ड में कुल 68 सर्ग (अध्याय) हैं। यह काण्ड हनुमान जी के लंका गमन, अशोक वाटिका में सीता माता से भेंट, और लंका दहन जैसी प्रमुख घटनाओं का वर्णन करता है।

काण्ड का नामसर्गों (अध्यायों) की संख्या
1.बालकाण्ड 77 सर्ग
2.अयोध्याकाण्ड 119 सर्ग
3.अरण्यकाण्ड 75 सर्ग
4.किष्किन्धाकाण्ड 67 सर्ग
5.सुन्दरकाण्ड 68 सर्ग
6.युद्धकाण्ड (लंकाकाण्ड)128 से 131 सर्ग (संस्करणों के आधार पर)
7.उत्तरकाण्ड 110 से 111 सर्ग

कुल सर्गलगभग 645 – 648 सर्ग

10 . पुराणलक्षणेषु न समुपलभ्यते –

(A) सर्गः

(B) वंशानुचरितम्

(C) विधिः ✓

(D) प्रतिसर्गः

पारंपरिक रूप से पुराणों के पाँच लक्षण (जिन्हें ‘पञ्चलक्षण’ भी कहा जाता है) माने गए हैं:
सर्ग (सृष्टि)प्रतिसर्ग (प्रलय और पुनर्सृष्टि)वंश (देवताओं और ऋषियों की वंशावली)मन्वन्तर (युग चक्र)वंशानुचरित (राजवंशों का इतिहास)।

  1. अधोलिखितानां काव्यलक्षणानां पूर्वापरक्रमं नियोजयत-

(1) शब्दार्थों काव्यम्

(2) रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्

(3) तददोषौ शब्दार्थों सगुणावनलङ्कृती पुनः क्वापि

(4) सहृदयहृदयाह्लादि शब्दार्थमयत्वमेव काव्यलक्षणम्

समुचितं विकल्पं चिनुत –

(A) 3, 4, 1, 2

(B) 2, 1, 3, 4

(C) 4, 2, 3, 1

(D) 1, 4, 3, 2 ✓

संस्कृत काव्यशास्त्र के आचार्यों द्वारा दी गई काव्य-लक्षणों की परिभाषाओं को उनके कालक्रम (Chronological Order) के अनुसार व्यवस्थित करने से संबंधित है।
यहाँ दी गई परिभाषाओं और उनके रचनाकारों का विवरण इस प्रकार है:
(1)शब्दार्थौ काव्यम् आचार्य भामह – 6वीं शताब्दी
(4)सहृदयहृदयाह्लादि शब्दार्थमयत्वमेव काव्यलक्षणम्आचार्य आनन्दवर्धन (ध्वन्यालोक) – 9वीं शताब्दी
(3)तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलङ्कृती पुनः क्वापिआचार्य मम्मट – 11वीं शताब्दी
(2)रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्पण्डितराज जगन्नाथ – 17वीं शताब्दी

सही कालक्रम:उपरोक्त विश्लेषण के अनुसार, सही क्रम 1, 4, 3, 2 है।अतः सही विकल्प (D) है।

  1. ‘न हि रसादृते कश्चिदर्थः’ प्रवर्तते इति केनोक्तम् –

(A) भामहेन

(B) भरतेन ✓

(C) विश्वनाथेन

(D) मम्मटेन

‘न हि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते’ (अर्थात् रस के बिना कोई भी अर्थ प्रवृत्त नहीं होता) यह प्रसिद्ध उक्ति भरतमुनि (B) द्वारा उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘नाट्यशास्त्र’ (षष्ठ अध्याय) में कही गई है।
“न हि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते।
विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः॥” (नाट्यशास्त्र 6.32)

  1. अधोलिखितेषु भर्तृहरिमतेन ध्वनेः भेदद्वयं चिनुत-

(A) पश्यन्ती, वैखरी

(B) प्राकृत, वैखरी

(C) प्राकृतः वैकृतः ✓

(D) वैखरी, वैकृतः

व्याकरण शास्त्र एवं आचार्य भर्तृहरि के वाक्यपदीय के अनुसार, स्फोट की अभिव्यक्ति करने वाली ध्वनि के दो भेद माने गए हैं: १. प्राकृत ध्वनि: यह वह मूल ध्वनि है जो स्फोट (अर्थबोधक नित्य शब्द) को अभिव्यक्त करती है।
२. वैकृत ध्वनि: यह प्राकृत ध्वनि के पश्चात उत्पन्न होती है। यह द्रुत, मध्य एवं विलंबित वृत्तियों या उच्चारण की भिन्नता का कारण होती है।

अन्य विकल्पों में दी गई ‘पश्यन्ती’ और ‘वैखरी’ वाक् (वाणी) के स्तर हैं, ध्वनि के भेद नहीं।

  1. अधोलिखितेषु उपन्यासकारं चिनुत-

(A) बाणभट्टः

(B) बिल्हणः

(C) दण्डी

(D) अम्बिकादत्तव्यासः ✓

व्याख्या:
पण्डित अम्बिकादत्तव्यास संस्कृत साहित्य के आधुनिक युग के एक महान उपन्यासकार माने जाते हैं।उनकी सुप्रसिद्ध रचना ‘शिवराजविजयम्’ को संस्कृत साहित्य का प्रथम ऐतिहासिक उपन्यास होने का गौरव प्राप्त है।अन्य विकल्पों की बात करें तो बाणभट्ट और दण्डी ‘गद्यकार’ (कथा/आख्यायिका लेखक) के रूप में प्रसिद्ध हैं, जबकि बिल्हण एक ‘महाकवि’ (विक्रमाङ्कदेवचरितम्) हैं।

  1. कुन्तकानुसारम् अधस्तनेषु सुकुमारमार्गस्य प्रथमो गुणः वर्तते ?

(A) माधुर्यम् ✓

(B) सौन्दर्यम्

(C) स्वाभाविकम्

(D) लावण्यम्

आचार्य कुन्तक के अनुसार ‘सुकुमारमार्ग’ का प्रथम गुण माधुर्य है। वक्रोक्ति-जीवितकार आचार्य कुन्तक ने काव्य की तीन शैलियाँ (मार्ग) मानी हैं—सुकुमार, विचित्र और मध्यम। उनके अनुसार सुकुमार मार्ग का पहला और प्रधान गुण ‘माधुर्य’ है, जिसे उन्होंने इस प्रकार परिभाषित किया है—
असमस्तमनोहरपदविन्यासजीवितम्।
माधुर्यं सुकुमारस्य मार्गस्य प्रथमो गुणः॥

  1. रत्नावल्यां उदयनस्य कञ्चुकी कः?
    (A) बाभ्रव्यः ✓

(B) यौगन्धरायणः

(C) वसन्तकः

(D) विक्रमः

रत्नावली नाटिका में उदयन (वत्सराज) का कञ्चुकी बाभ्रव्य है।
कवि: सम्राट हर्षवर्धन (श्रीहर्ष)
नायक: उदयन (कौशाम्बी नरेश)
मंत्री: यौगन्धरायण
विदूषक: वसन्तक

  1. “मदेकपुत्रा जननी जरातुरा………. “कस्येयमुक्तिः?

(A) दमयन्त्याः

(B) हंसस्य ✓

(C) भीमस्य

(D) नलस्य

यह उक्ति संस्कृत महाकाव्य ‘नैषधीयचरितम्’ (प्रथम सर्ग, श्लोक 135) से ली गई है, जिसके रचयिता श्रीहर्ष हैं। जब राजा नल स्वर्ण हंस को पकड़ लेते हैं, तब अपनी जान बचाने और नल के मन में करुणा जगाने के लिए हंस अपनी बेबसी का वर्णन करते हुए यह श्लोक कहता है:
“मदेकपुत्रा जननी जरातुरा, नवप्रसूतिर्वरटा तपस्विनी।गतिस्तयोरेष जनस्तमर्दयन्नहो ! विधे ! त्वां करुणा रुणद्धि न ॥”
अर्थ: मेरी माता है और उसका मैं ही एक अकेला पुत्र हूँ। ऊपर से वह वृद्धावस्था से पीड़ित है। मेरी पत्नी को अभी प्रसव हुआ है और वह भी बेचारी बहुत दुखी है। मैं ही उन दोनों का एकमात्र सहारा हूँ। हे विधाता! उस मुझ जैसे असहाय व्यक्ति को इस प्रकार कष्ट देते हुए तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती!

  1. कालानुसारेण तालिकां चिनुत-
    (A) भारविः

(B) भासः

(C) कालिदासः

(D) विश्वनाथः

(1) (A) (B) (C) (D)

(2) (B) (A) (C) (D)

(3) (C) (A) (B) (D)

(4) (B) (C) (A) (D) ✓

भास (B): ~ईसा पूर्व 5वीं शताब्दी – ईसा की आरंभिक शताब्दी (महाकवि भास सबसे प्राचीन हैं)।
कालिदास (C): ~प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व से चतुर्थ शताब्दी (गुप्त काल)
भारवि (A): ~छठी शताब्दी (किरातार्जुनीयम् के रचयिता)
विश्वनाथ (D): ~14वीं शताब्दी (साहित्यदर्पण के रचयिता)

उपरोक्त कालक्रम के आधार पर सही विकल्प (D) है:(B,C,A,D)

  1. मम्मटानुसारम् अप्रस्तुतप्रशंसालङ्कारः कतिविधः ?
    (A) द्विविधः

(B) पञ्चविधः ✓

(C) चतुर्विधः

(D) दशविधः
अप्रस्तुतप्रशंसा संस्कृत काव्यशास्त्र का एक प्रमुख अर्थालंकार है। जब किसी काव्य में ‘अप्रस्तुत’ (जिसका वर्णन आवश्यक या मुख्य न हो) का वर्णन करके उसके माध्यम से ‘प्रस्तुत’ (मुख्य और अभीष्ट विषय) का बोध या व्यंजना कराई जाती है, तब उसे अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार कहते हैं।
आचार्य मम्मट ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘काव्यप्रकाश’ में इसके पाँच भेद बताए हैं:

20.शान्तरसस्य स्थायिभावः कः ?

(A) उत्साहः

(B) शमः ✓

(C) हास

(D) शोकः
भरतमुनि के नाट्यशास्त्र और परवर्ती आचार्यों के अनुसार मुख्य रस और उनके स्थायी भाव इस प्रकार हैं:
श्रृंगार रस – रति (प्रेम)
हास्य रस – हास (हंसी)
करुण रस – शोक (दुःख)
रौद्र रस – क्रोध (गुस्सा)
वीर रस – उत्साह (जोश)
भयानक रस – भय (डर)
वीभत्स रस – जुगुप्सा (घृणा/ग्लानि)
अद्भुत रस – विस्मय (आश्चर्य)
शान्त रस – शम (निर्वेद/वैराग्य)

  1. का भारोपीया भाषा अस्ति ?

(A) ग्रीक ✓

(B) कन्नड

(C) तेलुगू

(D) मलयालम

ग्रीक भाषा भारोपीय (Indo-European) भाषा परिवार के अंतर्गत आती है। अन्य तीन भाषाएँ (कन्नड, तेलुगू और मलयालम) द्रविड़ भाषा परिवार की प्रमुख भाषाएँ हैं।
‘भारोपीय’ नाम भारत (भारत) और यूरोपीय (यूरोप) शब्दों को मिलाकर बना है। इसे भौगोलिक और ध्वन्यात्मक आधार पर दो मुख्य भागों में बांटा गया है:
शतम वर्ग: इसमें भारत-ईरानी, बाल्टिक-स्लाविक और अल्बानियाई भाषाएं शामिल हैं।
केंटुम वर्ग: इसमें जर्मनिक, केल्टिक, रोमांस और ग्रीक भाषाएं शामिल हैं।

  1. का भाषां ‘केन्दुम’-वर्गेण असम्बद्धा-

(A) ग्रीकभाषा

(B) इताली

(C) लैटिनभाषा

(D) संस्कृतभाषा ✓

भाषाविज्ञान (Linguistics) में भारोपीय भाषा परिवार को ‘सौ’ (100) शब्द के उच्चारण के आधार पर दो मुख्य वर्गों में बाँटा गया है: शतम (Satem) और केंटुम (Centum)।

  1. शतम (Satem) वर्ग की भाषाएँ –
    इस वर्ग की भाषाओं में प्राचीन भारोपीय ध्वनि ‘क’ का उच्चारण ‘श’ (श, स, या ज़) जैसी ऊष्म ध्वनियों में बदल गया। उदाहरण के लिए, ‘सौ’ के लिए संस्कृत में शतम और फ़ारसी में शद शब्द है।

इसके अंतर्गत आने वाले मुख्य भाषा परिवार और भाषाएँ हैं:

भारत-ईरानी (Indo-Iranian): संस्कृत, हिंदी, उर्दू, बंगाली, पंजाबी, मराठी, गुजराती, ओड़िया, कश्मीरी, नेपाली, फ़ारसी (Persian), और पश्तो।

बाल्टो-स्लाविक (Balto-Slavic): रूसी (Russian), पोलिश (Polish), यूक्रेनी (Ukrainian), चेक (Czech), बल्गेरियाई, लिथुआनियाई, और लातवियाई।

आर्मीनियाई (Armenian): आर्मीनिया की भाषा।

अल्बानियाई (Albanian): अल्बानिया की भाषा।

  1. केंटुम (Centum) वर्ग की भाषाएँइस वर्ग की भाषाओं में मूल भारोपीय ध्वनि ‘क’ का उच्चारण ‘क’ या ‘ह’ के रूप में ही सुरक्षित रहा। उदाहरण के लिए, ‘सौ’ के लिए लैटिन में केंटुम (Centum), ग्रीक में हेकातों, और अंग्रेज़ी में हंड्रेड (Hundred) शब्द है।

इसके अंतर्गत आने वाले मुख्य भाषा परिवार और भाषाएँ हैं:

जर्मनिक (Germanic): अंग्रेज़ी (English), जर्मन (German), डच (Dutch), स्वीडिश, नॉर्वेजियन, और डेनिश।

इटैलिक/रोमांस (Italic/Romance): लैटिन (Latin), फ्रेंच (French), स्पैनिश (Spanish), इतालवी (Italian), और पुर्तगाली (Portuguese)।

हेलेनिक (Hellenic): ग्रीक / यूनानी (Greek)।

केल्टिक (Celtic): आइरिश (Irish), वेल्श, और गैलिक।

तोखारी (Tocharian): मध्य एशिया की एक प्राचीन विलुप्त भाषा।

अनातोलियाई (Anatolian): हित्ती (Hittite) – यह भी एक प्राचीन विलुप्त भाषा है।

  1. प्रसिद्धध्वनिनियमेषु अर्वाचीनतमः कः?

(A) वर्नरनियमः ✓

(B) ग्रासमाननियमः

(C) ग्रिमनियमः

(D) विण्टरनिट्जनियमः

भाषाविज्ञान के प्रसिद्ध ध्वनि नियमों में सबसे अर्वाचीनतम (नवीनतम) वर्नर-नियम ।
भाषाविज्ञान में ध्वनि परिवर्तन के मुख्य नियमों का कालक्रम इस प्रकार है:
ग्रिम-नियम (Grimm’s Law): (१८२२) सबसे प्राचीन।
ग्रासमान-नियम (Grassmann’s Law): (१८६३) ग्रिम-नियम के बाद।
वर्नर-नियम (Verner’s Law): (१८७५) इन सभी में सबसे अर्वाचीन। कार्ल वर्नर ने ग्रिम-नियम की कमियों को दूर कर यह नियम दिया था।

  1. एषु शुद्धो मत्वर्थीयप्रयोगः कः?
    (A) विद्युद्वान्

(B) विद्युद्यान्

(C) विद्युत्वान् ✓

(D) विद्युत्मान्

संस्कृत व्याकरण में ‘मत्वर्थ’ (अर्थात ‘यह इसके पास है’ या ‘वाला’ के अर्थ में) ‘विद्युत्’ (बिजली) शब्द से ‘मतुप्’ प्रत्यय का प्रयोग होता है।
पाणिनीय व्याकरण के नियमानुसार ‘विद्युत्’ शब्द के अन्त में ‘त्’ होने के कारण मतुप् (मत्) प्रत्यय के ‘म्’ को ‘व्’ आदेश (वकार) हो जाता है, जिससे शुद्ध शब्द ‘विद्युत्वान्’ बनता है।

25 . ‘वास्तव्यः’ इत्यत्र ‘वस्’ धातोः ‘तव्यत्’प्रत्ययो भवति कस्मिन्नर्थे ?

(A) कर्तरि ✓

(B) कर्मणि

(C) भावे

(D) स्वार्थे

सामान्यतः ‘तव्यत्’ प्रत्यय कर्मवाच्य या भाववाच्य में होता है, परन्तु ‘वस्’ (रहना) धातु के संदर्भ में, जब इसका अर्थ ‘निवासी’ (रहने वाला) होता है, तब यह कर्त्ता (कर्तरि) अर्थ में प्रयुक्त होता है।

Exit mobile version